Magnetic Terms - KingsTemplate.Com

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लगभग 2000 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम एशिया के मैग्नीशिया नामक स्थान पर एक कत्थई रंग का पत्थर प्राप्त हुआ , जिसमें लोहे के कणों एवं छोटे – छोटे टुकड़ों को आकर्षित करने का एक विशेष गुण विद्यमान था।

लगभग उसी समय इस पदार्थ में एक अन्य विशेष गुण भी पाया गया , जिसके अनुसार इसे धागे से बाँधकर स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाने पर यह हमेशा एक विशेष दिशा north- south दिशा में रुक जाता है।

इनके कारण इस पत्थर का प्रयोग नाव चलाने वाले दिशा ज्ञात करने के करने लगे और उन्होंने इसका नाम लोडस्टोन (loadstone ) अर्थात् ‘ दिशा बताने वाला ‘ पत्थर रख दिया।

चुम्बकत्व का काम चुम्बकीय पदार्थों के अलावा विद्युत धारावाही चालक के द्वारा भी दिखाया जाता है , जिसे विद्युत चुम्बकत्व के नाम से जाना जाता है।

चुम्बकत्व का आण्विक सिद्धान्त Molecular Theory of Magnetism :- चुम्बक का लौह तथा लोहयुक्त पदार्थों को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण चुम्बकत्व कहलाता है।

I. प्राकृतिक चुम्बक Natural Magnet :- मूल रूप में पृथ्वी से प्राप्त होने वाले चुम्बक को प्राकृतिक आदि। इसकी आकृति एकसमान नहीं होती तथा इसके चुम्बकीय क्षेत्र तीव्रता बहुत कम होती है । इसलिए प्राकृतिक चुम्बक की अपेक्षा कृत्रिम चुम्बक अधिक प्रयोग में लाए जाते हैं।

II. कृत्रिम चुम्बक Artificial Magnet :- जिन चुम्बकों को किसी चुम्बकीकरण विधि द्वारा तैयार किया जाता है उने कृत्रिम चुम्बक कहते हैं। इस्पात अथवा लोहे की छड़ को प्राकृतिक चुम्बक पत्थर से रगड़ने से अथवा इस्पात / लोहे की छड़ के ऊपर विद्युतरोधित तांबे अथवा एल्युमीनियम के तार की क्वॉयल लपेटकर क्वॉयल में उच्च मान की डी.सी. धारा प्रवाहित करने पर उस इस्पात / लोहे की छड़ को कृत्रिम चुम्बक बनाया जा सकता है।

जटिल चुम्बक जो है दो प्रकार के होते हैं

i. स्थायी चुम्बक :- स्टील के छड़ को प्रबल शक्ति वाले चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव में रखा जाए तब चुम्बकीय प्रेरण के द्वारा यह चुम्बक बन जाता है। 

इसके बाद चुम्बकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी इस छड़ में चुम्बकीय प्रॉपर्टी स्थायी रूप से बना रहता हैं और यह छड़ चुम्बक के रूप में कार्य करने लगता है। 

इस प्रकार इस्पात की छड़ स्थायी चुम्बक बन जाती है। इन चुम्बकों में चुम्बकीय गुण लम्बे समय तक विद्यमान रहते हैं।

ii. अस्थायी चुम्बक :- जिन भी चुम्बकीय पदार्थों को चुम्बकीय क्षेत्र के इफ़ेक्ट से रखे जाने पर इनमें चुम्बक गुण आ ही जाते हैं और इनको चुम्बकीय क्षेत्र से हटा देने पर इनके चुम्बकीय गुण खत्म हो जाते हैं , उन पदार्थों को अस्थायी चुम्बक ( temporary magnet ) कहते हैं। 

अस्थायी चुम्बक को बनाने के लिए नरम लोहा और सिलिकॉन – लोहा मिश्रित धातु (silicon steel alloy ) आदि का उपयोग किया जाता हैं।

चुम्बक निर्माण विधियाँ Magnet Formation strategies

चुम्बक तथा चुम्बकीय पदार्थ की सहायता से हम कृत्रिम चुम्बक का निर्माण कर सकते हैं । चुम्बक बनाने की विधियाँ निम्न प्रकार हैं।

(I). एक स्पर्श विधि :- इस विधि में एक छड़ – चुम्बक को ( किसी एक ध्रुव की ओर से ) स्टील की छड़ पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक 50-60 बार रगड़ा जाता है , जिससे स्टील की छड़ चुम्बक बन जाती है।

छड़ के जिस सिरे से चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को रगड़ना प्रारम्भ किया जाता है वह सिरा उत्तरी – ध्रुव बनता है तथा दूसरा सिरा दक्षिणी – ध्रुव बन जाता है।

(II). दोहरी स्पर्श विधि :- इस विधि में स्टील की एक छड़ को दो छड़ लकड़ी के एक गुटके से पृथक्कृत दो अन्य छड़ – चुम्बकों को स्टील की छड़ के मध्य बिन्दु पर रखा जाता है और उन्हें बिना उठाए छड़ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक 50-60 बार रगड़ा जाता है।

रगड़ने की क्रिया उसी बिन्दु पर समाप्त की जाती है जहाँ से प्रारम्भ की गई थी। चुम्बकों की ध्रुवताएँ तथा स्टील की छड़ में उत्पन्न हर चुम्बकत्व की ध्रुवताएँ होती हैं।

(III). विभाजित स्पर्श :- चुम्बकों पर स्टील की छड़ को रखा जाता है , परन्तु इसमें रगड़ने वाले दो छड़ – चुम्बकों के बीच कोई लकड़ी का गुटका आदि नहीं रखा जाता और दोनों छड़ – चुम्बकों को , स्टील की छड़ के मध्य बिन्दु से उसके सिरों की ओर विपरीत दिशाओं में रगड़ा जाता है।

दोनों छड़ – चुम्बकों को उठाकर पुन : मध्य बिन्दु पर रखकर सिरों की ओर रगड़ा जाता है। 50-60 बार इसे प्रक्रिया को दोहराने पर पर स्टील की छड़ , चुम्बक बन जाती है।

इस विधि में भी चुम्बकों की ध्रुवताएँ तथा स्टील को छड़ में उत्पन्न हुए चुम्बकत्व की ध्रुवताएँ के अनुसार होती हैं।

(IV). वैद्युतिक विधि :- चुम्बक बनाने की उपरोक्त तीनों विधियों द्वारा बनाए गए चुम्बक , शक्तिशाली नहीं होते।

अत : शक्तिशाली स्थायी चुम्बक बनाने के लिए वैद्युतिक विधि अपनाई जाती है। इस विधि में चुम्बक बनाए जाने वाली स्टील की छड़ को एक क्वॉयल के बीच में रखा जाता है और क्वॉयल में शक्तिशाली D.C. विद्युत करंट प्रवाह की जाती है कुछ ही घण्टों में स्टील की छड़ चुम्बक बन जाती है।

यदि स्टील की छड़ के जगह पर नरम लोहे की छड़ प्रयोग किया जाए तो उसमें चुम्बकत्व का अस्तित्व तभी तक रहेगा जब तक कि उसकी क्वॉयल में से विद्युत करंट प्रवाह होती रहती है इस प्रकार बनी चुम्बक विद्युत – चुम्बक कहलाता है।

इस विधि में स्टील की छड़ , प्रेरण द्वारा चुम्बक बनती है । इसलिए यह विधि , प्रेरण विधि कहलाती है।

(V) . प्रेरण विधि :- इस विधि में चुम्बक बनाए जाने वाली छड़ को , क्वॉयल के बीच में रखने की आवश्यकता नहीं होती।

इसमें एक अधिक लपेट वाली क्वॉयल के बीच एक नर्म लोहे की छड़ रखी होती है , जिसका एक सिरा , क्वॉयल से कुछ बाहर निकला रहता है और उसी के ऊपर स्टील की छड़ रख दी जाती है।

यह उपकरण पोल – चार्जर कहलाता है। चुम्बक बनाए जा सकने के कारण इसका प्रयोग व्यापारिक स्तर पर सबसे अधिक किया जाता है।

Magnetic Terms

लगभग 2000 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम एशिया के मैग्नीशिया नामक स्थान पर एक कत्थई रंग का पत्थर प्राप्त हुआ , जिसमें लोहे के कणों एवं छोटे – छोटे टुकड़ों को आकर्षित करने का एक विशेष गुण विद्यमान था।

लगभग उसी समय इस पदार्थ में एक अन्य विशेष गुण भी पाया गया , जिसके अनुसार इसे धागे से बाँधकर स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाने पर यह हमेशा एक विशेष दिशा north- south दिशा में रुक जाता है।

इनके कारण इस पत्थर का प्रयोग नाव चलाने वाले दिशा ज्ञात करने के करने लगे और उन्होंने इसका नाम लोडस्टोन (loadstone ) अर्थात् ‘ दिशा बताने वाला ‘ पत्थर रख दिया।

चुम्बकत्व का काम चुम्बकीय पदार्थों के अलावा विद्युत धारावाही चालक के द्वारा भी दिखाया जाता है , जिसे विद्युत चुम्बकत्व के नाम से जाना जाता है।

चुम्बकत्व का आण्विक सिद्धान्त Molecular Theory of Magnetism :- चुम्बक का लौह तथा लोहयुक्त पदार्थों को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण चुम्बकत्व कहलाता है।

I. प्राकृतिक चुम्बक Natural Magnet :- मूल रूप में पृथ्वी से प्राप्त होने वाले चुम्बक को प्राकृतिक आदि। इसकी आकृति एकसमान नहीं होती तथा इसके चुम्बकीय क्षेत्र तीव्रता बहुत कम होती है । इसलिए प्राकृतिक चुम्बक की अपेक्षा कृत्रिम चुम्बक अधिक प्रयोग में लाए जाते हैं।

II. कृत्रिम चुम्बक Artificial Magnet :- जिन चुम्बकों को किसी चुम्बकीकरण विधि द्वारा तैयार किया जाता है उने कृत्रिम चुम्बक कहते हैं। इस्पात अथवा लोहे की छड़ को प्राकृतिक चुम्बक पत्थर से रगड़ने से अथवा इस्पात / लोहे की छड़ के ऊपर विद्युतरोधित तांबे अथवा एल्युमीनियम के तार की क्वॉयल लपेटकर क्वॉयल में उच्च मान की डी.सी. धारा प्रवाहित करने पर उस इस्पात / लोहे की छड़ को कृत्रिम चुम्बक बनाया जा सकता है।

जटिल चुम्बक जो है दो प्रकार के होते हैं

i. स्थायी चुम्बक :- स्टील के छड़ को प्रबल शक्ति वाले चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव में रखा जाए तब चुम्बकीय प्रेरण के द्वारा यह चुम्बक बन जाता है। 

इसके बाद चुम्बकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी इस छड़ में चुम्बकीय प्रॉपर्टी स्थायी रूप से बना रहता हैं और यह छड़ चुम्बक के रूप में कार्य करने लगता है। 

इस प्रकार इस्पात की छड़ स्थायी चुम्बक बन जाती है। इन चुम्बकों में चुम्बकीय गुण लम्बे समय तक विद्यमान रहते हैं।

ii. अस्थायी चुम्बक :- जिन भी चुम्बकीय पदार्थों को चुम्बकीय क्षेत्र के इफ़ेक्ट से रखे जाने पर इनमें चुम्बक गुण आ ही जाते हैं और इनको चुम्बकीय क्षेत्र से हटा देने पर इनके चुम्बकीय गुण खत्म हो जाते हैं , उन पदार्थों को अस्थायी चुम्बक ( temporary magnet ) कहते हैं। 

अस्थायी चुम्बक को बनाने के लिए नरम लोहा और सिलिकॉन – लोहा मिश्रित धातु (silicon steel alloy ) आदि का उपयोग किया जाता हैं।

चुम्बक निर्माण विधियाँ Magnet Formation strategies

चुम्बक तथा चुम्बकीय पदार्थ की सहायता से हम कृत्रिम चुम्बक का निर्माण कर सकते हैं । चुम्बक बनाने की विधियाँ निम्न प्रकार हैं।

(I). एक स्पर्श विधि :- इस विधि में एक छड़ – चुम्बक को ( किसी एक ध्रुव की ओर से ) स्टील की छड़ पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक 50-60 बार रगड़ा जाता है , जिससे स्टील की छड़ चुम्बक बन जाती है।

छड़ के जिस सिरे से चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को रगड़ना प्रारम्भ किया जाता है वह सिरा उत्तरी – ध्रुव बनता है तथा दूसरा सिरा दक्षिणी – ध्रुव बन जाता है।

(II). दोहरी स्पर्श विधि :- इस विधि में स्टील की एक छड़ को दो छड़ लकड़ी के एक गुटके से पृथक्कृत दो अन्य छड़ – चुम्बकों को स्टील की छड़ के मध्य बिन्दु पर रखा जाता है और उन्हें बिना उठाए छड़ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक 50-60 बार रगड़ा जाता है।

रगड़ने की क्रिया उसी बिन्दु पर समाप्त की जाती है जहाँ से प्रारम्भ की गई थी। चुम्बकों की ध्रुवताएँ तथा स्टील की छड़ में उत्पन्न हर चुम्बकत्व की ध्रुवताएँ होती हैं।

(III). विभाजित स्पर्श :- चुम्बकों पर स्टील की छड़ को रखा जाता है , परन्तु इसमें रगड़ने वाले दो छड़ – चुम्बकों के बीच कोई लकड़ी का गुटका आदि नहीं रखा जाता और दोनों छड़ – चुम्बकों को , स्टील की छड़ के मध्य बिन्दु से उसके सिरों की ओर विपरीत दिशाओं में रगड़ा जाता है।

दोनों छड़ – चुम्बकों को उठाकर पुन : मध्य बिन्दु पर रखकर सिरों की ओर रगड़ा जाता है। 50-60 बार इसे प्रक्रिया को दोहराने पर पर स्टील की छड़ , चुम्बक बन जाती है।

इस विधि में भी चुम्बकों की ध्रुवताएँ तथा स्टील को छड़ में उत्पन्न हुए चुम्बकत्व की ध्रुवताएँ के अनुसार होती हैं।

(IV). वैद्युतिक विधि :- चुम्बक बनाने की उपरोक्त तीनों विधियों द्वारा बनाए गए चुम्बक , शक्तिशाली नहीं होते।

अत : शक्तिशाली स्थायी चुम्बक बनाने के लिए वैद्युतिक विधि अपनाई जाती है। इस विधि में चुम्बक बनाए जाने वाली स्टील की छड़ को एक क्वॉयल के बीच में रखा जाता है और क्वॉयल में शक्तिशाली D.C. विद्युत करंट प्रवाह की जाती है कुछ ही घण्टों में स्टील की छड़ चुम्बक बन जाती है।

यदि स्टील की छड़ के जगह पर नरम लोहे की छड़ प्रयोग किया जाए तो उसमें चुम्बकत्व का अस्तित्व तभी तक रहेगा जब तक कि उसकी क्वॉयल में से विद्युत करंट प्रवाह होती रहती है इस प्रकार बनी चुम्बक विद्युत – चुम्बक कहलाता है।

इस विधि में स्टील की छड़ , प्रेरण द्वारा चुम्बक बनती है । इसलिए यह विधि , प्रेरण विधि कहलाती है।

(V) . प्रेरण विधि :- इस विधि में चुम्बक बनाए जाने वाली छड़ को , क्वॉयल के बीच में रखने की आवश्यकता नहीं होती।

इसमें एक अधिक लपेट वाली क्वॉयल के बीच एक नर्म लोहे की छड़ रखी होती है , जिसका एक सिरा , क्वॉयल से कुछ बाहर निकला रहता है और उसी के ऊपर स्टील की छड़ रख दी जाती है।

यह उपकरण पोल – चार्जर कहलाता है। चुम्बक बनाए जा सकने के कारण इसका प्रयोग व्यापारिक स्तर पर सबसे अधिक किया जाता है।

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